Monday, 11 October 2010

अपनी बात

कोई अच्छी पुस्तक पढ़ने को मिले तो कई बार मन करता है कि सुधी पुस्तक प्रेमियों से उसके बारे में चर्चा की जाए. बहुत पहले कहीं पढ़ा था कि यदि हम मोमबत्ती न भी बन सकें तो हमें दर्पण बन जाना चाहिए जिससे उन मोमबत्तियों के प्रकाश को उन कोनों में भी पहुंचा सकें जहां वह स्वतः नहीं पहुँच पाया है. यह ब्लॉग इसी दिशा में एक विनम्र सा कदम है.
एक बात प्रारम्भ में ही स्पष्ट कर देना समीचीन होगा. मैं कोई विद्वान समालोचक नहीं हूं जो किसी भी पुस्तक के बारे में कोई निर्णायक अंतिम बात कह सकूं. मेरा प्रयास तो मात्र इतना रहेगा कि यह बता सकूं कि कोई पुस्तक पढ़ने पर मुझे कैसा लगा.तुलसी के शब्दों में- "कवि न होऊं नहीं चतुर कहावउं, मति अनुसार राम गुन गावउं. सुधीजनों के सुझावों, दिशा-निर्देशों, और आशीर्वाद की अपेक्षा रहेगी.